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कश्मीर फाइल की समीक्षा करते हुए मेहता साहेब उर्फ़ शैलेश लोढ़ा ने कहा,“फिल्म नहीं, आंदोलन है ये

फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ एक तरह से इतिहास की उन ‘फाइल्स’ को पलटने की कोशिश है जिनमें भारत देश में वीभत्स नरसंहारों के चलते हुए सबसे बड़े पलायन की कहानी है। देश में कश्मीर पंडित ही शायद इकलौती ऐसी कौम है जिसे उनके घर से आजादी के बाद बेदखल कर दिया गया है और करोड़ों की आबादी वाले इस देश के किसी भी हिस्से में कोई हलचल तक न हुई। जिस कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक होने वाले देश का दम बार बार बड़े बड़े नेता भरते रहे हैं, उसके हालात की ये बानगी किसी भी इंसान को सिहरा सकती है।
कोई 32 साल पहले शुरू होती फिल्म की इस कहानी की शुरुआत ही एक ऐसे लम्हे से होती है जो क्रिकेट के बहाने एक बड़ी बात बोलती है। घाटी में जो कुछ हुआ वह दर्दनाक रहा है। उसे पर्दे पर देखना और दर्दनाक है। आतंक का ये एक ऐसा चेहरा है जिसे पूरी दुनिया को दिखाना बहुत जरूरी है। कहानी कहने में इसके एक डॉक्यूमेंट्री बन जाने का भी खतरा था, लेकिन सच्चाई लाने के लिए खतरों से किसी को तो खेलना ही होगा।

फिल्म नहीं आंदोलन है

फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ को इसके कलाकारों की बेहतरीन अदाकारी के लिए भी देखा जाना चाहिए। अनुपम खेर अरसे बाद अपने पूरे रंग मे दिखे हैं। वह परदे पर जब भी आते हैं, दर्द का एक दरिया सा उफनाता है और दर्शकों को अपने साथ बहा ले जाता है। उनका अभिनय फिल्म में ऐसा है कि इसे देखने के बाद अगले साल का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार उनके नाम होना बनता ही है। दर्शन कुमार ने फिल्म के अतीत को वर्तमान से जोड़ने का शानदार काम किया है। उनके कैंपस वाले भाषण और इस दौरान उनकी भाव भंगिमाएं देखने लायक हैं। चिन्मय मांडलेकर का अभिनय फिल्म की एक और मजबूत कड़ी है। तकनीकी तौर पर फिल्म बहुत कमाल की भले न हो लेकिन उदय सिंह मोहिले ने अपने कैमरे के सहारे फिल्म का दर्द धीरे धीरे रिसते देने में कामयाबी पाई है। फिल्म की अवधि इसकी सबसे कमजोर कड़ी है। फिल्म की अवधि कम करके इसका असर और मारक किया जा सकता है। फिल्म का संगीत कश्मीर के लोक से प्रेरणा पाता है और हिंदी भाषी दर्शकों को इसे समझाने के लिए विवेक ने मेहनत भी काफी की है। मुख्यधारा की फिल्म के हिसाब से फिल्म का संगीत हालांकि कमजोर है। लेकिन, इस सबके बावजूद फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ कथानक के लिहाज से इस साल की एक दमदार फिल्म साबित होती है।

जब शैलेश लोढ़ा को रोका गया

कल शैलेश लोढ़ा को पीवीआर जुहू में स्पॉट किया गया। तारक मेहता का उल्टा चश्मा ने लाल बॉर्डर वाला काला स्वेटर पहना हुआ था और इसे काले रंग की पतलून के साथ जोड़ा था। जैसे ही उन्होंने शटरबग्स के लिए पोज़ दिया, एक पपराज़ी ने उनसे पूछा, “सर कोन्सा मूवी देख के आ रहे हो?” शैलेश लोढ़ा ने जवाब दिया, “द कश्मीर फाइल्स।” जब उनकी समीक्षा के लिए कहा गया, तो शैलेश ने कहा, “ मेरे पास बोल ने के लिए कुछ नहीं है। कुछ कह नहीं पाउगा में, फिल्म नहीं आंदोलन है ये।”
इस बीच, शैलेश लोढ़ा असित कुमार मोदी द्वारा निर्मित सिटकॉम में तारक मेहता की भूमिका निभाते हैं। इस शो में दिलीप जोशी, मुनमुन दत्ता, राज अनादकट, पलक सिधवानी भी हैं। शैलेश लोढ़ा तारक मेहता का उल्टा चश्मा शो में पिछले 13 सालो से दर्शको का मनोरंजन कर रहे है। उन्होंने मेहता साहेब का किरदार निभाते हुए लाखो लोगो का दिल जित लिया है।

विवाद में है तारक मेहता स्टार कास्ट

 

तारक मेहता का उल्टा चश्मा इन दिनों अपनी स्टार कास्ट को लेकर काफी विवादों में रहा है। ऐसी खबरें थीं कि शैलेश और दिलीप के बीच एक कथित विवाद को लेकर बात नहीं हो रही थी। बाद में ऐसी ही खबर राज अनादकट और दिलीप जोशी के इर्द-गिर्द घूमती रही। मुनमुन दत्ता ने अपने जातिवादी गाली विवाद और राज अनादकट के साथ कथित अफेयर पर भी खूब हंगामा किया।

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