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ऐसी कौनसी कपूर खानदान की परंपरा तोड़ी थी शशि कपूर की बेटी ने?जानिए!

हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री के जाने माने परिवारों में से कपूर खानदान उनमें से एक है। कपूर खानदान को फिल्मी जगत से जुड़ने का रास्ता पृथ्वीराज कपूर के द्वारा दिखा था जिनकी गिनती बॉलीवुड को जन्म देने वाले नामो में होती है पर पृथ्वीराज का एक बनाया हुआ नियम था जो की कठोर था और आज के ज़माने में देखे तो उससे सेक्सिस्ट भी कहा जा सकता है।

क्या कठोर परंपरा थी कपूर खानदान की बेटियों के लिए?

दरअसल पृथ्वीराज ने अपने परिवार जनों के लिए यह नियम बनाया था की घर की महिलाए फिल्मों में काम नहीं करेंगी तभी कपूर खानदान के जिन भी बेटो ने अभिनेत्रियों से शादी की उन्होनें धीरे धीरे करके बॉलीवुड में काम करना छोड़ ही दिया। पृथ्वीराज के 6 बच्चे थे जिनमें से सबसे मशहूर राज कपूर, शम्मी कपूर और शशि कपूर। यह नियम का मान रखते हुए पृथ्वीराज की बेटियों ने अपने पिता को भुल्ला कर यह नियम तो नही तोड़ा पर हां उनकी पोती और परपोतियों ने तो उनके इस नियम को अस्वीकार किया और फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखे।

संजना कपूर

लोगो को ऐसा व्यतीत होता है की कपूर खानदान की यह परम्परा करिश्मा कपूर ने अस्वीकार करके बॉलीवुड में कदम रखे सुपरस्टार बन्ने तक का सफर तय किया पर असलियत तो यह है की कपूर खानदान की सबसे पहली बेटी जिसने फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा वो और कोई नही बल्की शशि कपूर की सुपुत्री संजना कपूर थी। शशि कपूर को एक फॉरेनर से प्यार हो गया था और उन्होंने उस्सी से 1958 में विवाह कर लिया जिनका नाम जेनिफर था। दोनो की तीन संतान हुई जिसमें से दो पुत्र व एक पुत्री जिनका नाम संजना कपूर है । संजना पहली दफा 36 चौरंगी लेन नमक फिल्म में नज़र आई थी जिसकी लीड अभिनेत्री उनकी मां जेनिफर थी और संजना ने अपनी मां के बचपन के रोल में फिल्म में भूमिका निभाई। संजना ने हिंदी फिल्मों में बतौर लीड एक्ट्रेस तो काम नहीं किया पर फिल्मों में अभिनेत्री के तौर पर शामिल जरूर हुई है जिनमें से कुछ का नाम है–उत्सव, सलाम बॉम्बे, हीरो हीरालाल और अरण्यका। संजना भल्ले ही दिखने में अपनी फॉरैनर मां पर गई हो पर उनकी पैदाइश हिंदुस्तान के मुम्बई शहर की है। उन्हे कई सालो तक फिल्मों में देखा तो नही गया पर वह फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा तब भी थी। उन्होंने अपने दादाजी श्री पृथ्वीराज कपूर का थियेटर जिसका नाम प्पृथ्वी थियेटर है और मुम्बई में स्तिथ है उसकी बाग दौर 2012 तक संभाली पर अब उन्हे ना ही थियेटर के नाटकों में पाया जाता है और ना ही किसी फिल्मी पार्टी में।

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