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ज़िंदगी की कठिनाइयों का पहाड़ तोड़कर कैसे आगे बढ़े नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी?

बॉलीवुड के टैलेंटेड अभिनेत्र नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी आज जितनी ही बड़ी उचायी पर है उन्होंने अपनी ज़िंदगी में उतनी ही कठिन परिस्थितियों का सामना किया है। उतार चढ़ाव ने उनको इतना कुछ सिखाया को वही सीख आज उनके काम आ रही है। जैसी भी परिस्थितियां रही पर उन्होंने कभी हार नही मानी और मेहनत करते रहे । चाहे जितना ही मुश्किल रास्ता हो पर उन्होंने चलना नही छोड़ा।

धनिया बेचने से लेकर वॉच मैन बने

एक समय तो उनकी जिंदगी में ऐसा आया की उनकी दो वक्त की रोटी का ठिकाना ना था। धनिया बेचने से लेकर वॉच मैन की ड्यूटी तक कर चुके है सिद्दीकी। उन्होंने एक बार यह भी बताया था कि वो दोस्तो से उधार लेते थे और दो दिन बाद जब उधर चुकाने का समय आता था तो किसी और से उधार लेकर पहला उधार चुकाते थे। उन्होंने कम से कम 100 से ज्यादा ऑडिशन दिए होंगे इस उम्मीद में की एक दरवाज़ा नही तो दूसरा दरवाज़ा तो खुलेगा सिनेमा जगत का ताकि उनके किस्मत का दरवाज़ा खुल जाए। उनके लिए बॉलीवुड इंडस्ट्री के द्वार तो खुले पर 12 साल के परिश्रम के बाद।

मां के कहे शब्दो ने दी हिम्मत!

वह पहले एक अपार्टमेंट वाले मकान में 4 लोगो के साथ रहते थे। उस टाईम जिंदगी जीना ही उनके लिए कठिन काम था क्युकी उनके रोज की आमदनी का भी ठिकाना नही था। कठिनाई के हिस्से तो उनके भाग्य में कई लिखे थे और शायद वो एक अच्छी ज़िंदगी जीने का ख्वाब भी भूल जाते पर उनकी मां की कही हुई एक बात उनके जेहन में रह गई जिसने नवाज़ुद्दीन को ना ही सिर्फ हिम्मत दी बल्कि उन्हें और परिश्रम करने के लिए ताकत के रूप में उनके साथ रही और वह शब्द यह थे की “कचरे की ढेर की जगह बदलती है , हम तो फिर भी इंसान है” और सच ही हुआ नवाज़ुद्दीन की जगह बदली एक स्ट्रगलिंग एक्टर से सुपरस्टार बनने का सफर सिद्दिकी ने तय कर ही लिया।

उत्तरप्रदेश से मायानगरी – मुंबई तक का सफर

वह उत्तर प्रदेष के एक छोटे से गांव से आए थे और मुंबई जैसी माया नगरी में रहना उनके लिए हलवा खाने जितना आसान काम कभी था ही नही। सिद्दिकी के परिवार में 11 जन थे , उनके माता पिता और उनके 8 भाई बहन । घर में सब से बड़े बेटे होने के कारण जाहिर सी बात है उनपर सब ही परिवार जनों की जिम्मेदारी आ गई। जब वह पहली बार मायानगरी–मुंबई आए तो उन्हे लगा इस शहर की भागती दौड़ती जिंदगी में वह टिक नही पाएंगे। उन्हे कम से कम एक महीना लगा सब समझने में , मुंबई जैसी बड़े शहर की जिंदगी की दौड़ में भाग लेने के लिए। वह अपने परिवार के साथ राम लीला देखने जाते थे और वही से उनके मन में एक्टर बनने के ख्वाब ने जन्म लिया और उनकी माता पिता की प्रेरणा उन्हे मुंबई ले आई।

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